मंगलमय अवसर पर गुरुदेव भगवान के जीवन का संक्षिप्त परिचय आप सब के साथ साँझा किया जा रहा है

आप सबको राष्ट्रोत्कर्ष दिवस की हार्दिक एंव मंगल शुभकामनाएँ।

 

मंगलमय अवसर पर गुरुदेव भगवान के जीवन का संक्षिप्त परिचय आप सब के साथ साँझा किया जा रहा है
  1. आज के इस मंगलमय अवसर पर गुरुदेव भगवान के जीवन का संक्षिप्त परिचय आप सब के साथ साँझा किया जा रहा है। #राष्ट्रोत्कर्षदिवस

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पुरीके वर्तमान 145वें श्रीमद्जगद्गुरु शंकराचार्य अनेक विलक्षणताओंके धनी महान विभूति हैं। इनका बचपनका नाम नीलांबर झा है किंतु अपने गांवमें वह ‘घुरन’के नामसे प्रसिद्ध थे। इनका जन्म विक्रम संवत 2000 आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी उपरांत चतुर्दशी बुधवार रोहिणी नक्षत्र वृष राशि तदनुसार 30 जून 1943 को दरभंगा जिला अब मधुबनी जिला अंतर्गत हरिपुरबक्शी टोल नामक ग्राममें हुआ था। उनके पिताजीका नाम श्री लाल बंसी झा था, जो बचवे झा या बचवे बाबूके नामसे प्रसिद्ध थे। वे दरभंगा नरेशके राज पंडित थे। उनकी माताका नाम गीता देवी था।

 

 

मंगलमय अवसर पर गुरुदेव भगवान के जीवन का संक्षिप्त परिचय आप सब के साथ साँझा किया जा रहा है
मंगलमय अवसर पर गुरुदेव भगवान के जीवन का संक्षिप्त परिचय आप सब के साथ साँझा किया जा रहा है

बालक नीलांबरका बचपन अनेक विचित्रताओंसे भरा रहा। बचपनमें ही उनको आत्मबोध हुआ। भगवान श्री कृष्णके दर्शन भी हुए और बचपनसे ही उनके मनमें श्री वृंदावनका दर्शन करनेकी इच्छा भी जगी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांवमें ही हुई किंतु हाई स्कूलकी शिक्षाके लिए वे अपने अग्रज श्री श्रीदेव झाके साथ दिल्ली चले गये।

दिल्लीमें ही धर्म संघके वार्षिक महाधिवेशनके अवसरपर उन्हें धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराजका दर्शन हुआ। उसी समय उन्होंने स्वामी श्री करपात्री जी महाराजको अपने सद्गुरुके रूपमें पहचान लिया। जब वे दसवीं कक्षाके छात्र थे तभी रामलीला मंचनमें भगवान रामके बनवासका प्रसंग सुनकर उनके मनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ और वह रातमें बिना किसीको कुछ बताएं पैदल ही बनारसके लिए प्रस्थान कर दिए। कानपुर लखनऊ आदि अनेक स्थानोंपर विभिन्न साधु-संतोंके दर्शन करते हुए एवं अनुभव प्राप्त करते हुए वह नैमिषारण्य पहुंचे। ब्रह्मचर्यकी दीक्षाके समय उनका नाम प्रबुद्धचैतन्य रखा गया जो बादमें धर्मचैतन्य तथा अंतमें ध्रुवचैतन्य हुआ।

 

मंगलमय अवसर पर गुरुदेव भगवान के जीवन का संक्षिप्त परिचय आप सब के साथ साँझा किया जा रहा है

 

7 नवंबर 1966 को दिल्लीमें पार्लियामेंटके समक्ष आयोजित गोरक्षा सम्मेलनमें भाग लेनेके कारण 9 नवंबरको उन्हें बंदी बना लिया गया था और वह 52 दिनों तक तिहाड़ जेलमें बंद रहे थे। नैमिषसे वे पैदल ही यात्रा पर निकले और 8 महीनोंकी कठिन पैदल यात्रा करते हुए रास्तेमें भूख प्याससे जूझते हुए वे श्रृंगेरी मठ पहुंचे। श्रृंगेरी मठमें वे 87 दिनों तक रहे। कपट पूर्वक नैमिषके अधिपति जी द्वारा बुलवानेपर वे पुनः नैमिष पहुंचे जहां उन्हें अनेक प्रकारकी यातनाओंका सामना करना पड़ा। उन्हें विष भी पिलाया गया जिससे वे भगवानकी इच्छा समझते हुए पी लिए। उनकी हालत बिल्कुल खराब हो गई थी। हां दवाके नामपर उन्हें कांचका चूर्ण भी पिलाया गया था। पुरीमें जगन्नाथ भगवानके दर्शन हेतु वह बनारससे पैदल ही जगन्नाथपुरी आए थे। यहाँ कई आश्रमों और मठोंमें वे प्रसाद भोजन एवं निवासके लिए घूमते रहे किंतु कहीं भी इनको उचित व्यवस्था नहीं मिल सकी थी।

पुरीमठके 144वें शंकराचार्य भगवानकी सेवामें यह कई बार रह चुके थे। किंतु इनके पुरी आनेपर उस पूर्व परिचयका कोई प्रभाव नहीं दिखा। वैशाख कृष्ण एकादशी गुरुवार संवत 2073 तदनुसार 18 अप्रैल 1974 को पूज्यपाद् धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराजके करकमलोंसे इन्होंने सन्यास ग्रहण किया। उन्होंने आपका नाम निश्चलानंद सरस्वती रखा।
सन् 1976 से 1981 तक आपने पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराजसे प्रस्थानत्रयी, पंचदशी, वेदांत परिभाषा, न्यायमीमांसा तंत्र आदिका मनोयोगपूर्वक अध्ययन किया। सन् 1982 से 1987 तक आपने तत्कालीन पुरीपीठके शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराजसे खंडनखंड और यजुर्वेदादिका विशेष अध्ययन किया। आपने पांच चतुर्मास उनके साथ बिताया था।

श्रीमद्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाभागने आपको पुरीपीठके शंकराचार्यपदपर पदस्थापित करनेका निश्चय कर लिया था। आपकी प्रतिभा, कुशाग्र बुद्धि एवं सनातन धर्मके प्रति आपकी श्रद्धा एवं गुरुजनोंमें निरंतर आस्थाको देखते हुए उन्होंने आपको सन् 1992 में महाशिवरात्रिके अवसरपर पुरीके 145वें मान्य श्रीमद्जगद्गुरु शंकराचार्यके रूपमें पदास्थापित किया।

🚩जय जगन्नाथ🚩🚩जय गुरुदेव🚩

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