“स्वतंत्रता संग्राम के चरम चरण में अंग्रेजो ने भारत का आकलन किया। उनने भारत को दिशाहीन करने की भावना से एक कूटनीति का प्रयोग किया कि राजनेताओं में से ही किसी वरिष्ठ राजनेता को महात्मा के रूप में ख्यापित किया जाएतो व्यासपीठ से सम्बद्ध जो आचार्य है, परम्परा के शंकराचार्य आदि वह अन्यथा सिद्ध हो जाएगे !

 

किसी की उपयोगिता को आप निरस्त कर दीजिए, उसका आस्तित्व विलीन हो गया।
किसी की उपयोगिता को आप निरस्त कर दीजिए, उसका आस्तित्व विलीन हो गया।

किसी की उपयोगिता को आप निरस्त कर दीजिए, उसका आस्तित्व विलीन हो गया।

“अन्यथा का अर्थ क्या है …????”

यह न्याय – दर्शन का शब्द है, वेदांत में भी प्रयुक्त होता है।

किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को आप छल, बल डंके की चोट से अन्यथा सिद्ध कीजिए, हो तो नहीं सकता वह लेकिन आस्तित्व रहने पर भी उपयोगिता समाप्त हो गयी, निरस्त कर दिया गया; तो यह अंग्रेजो की कूटनीति थी।

मैं निन्दा की दृष्टि से कुछ नहीं कहूँगा।

सबसे पहले रविन्द्रनाथ टैगोर जी ने गांधीजी को ही महात्मा शब्द से संबोधित किया, यह इतिहास है। वह अनुकृति विश्व व्यापी बन गयी; तब हुआ क्या ….????

एक राजनेता जब संत के रूप में ख्यापित कर दिए गए। उसके पीछे अंग्रेजो की कूटनीति थी, कि अपने आप सनातन वर्ण व्यवस्था के पक्षधर स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज आदि अन्यथा सिद्ध हो जाए।”

—– परमपूज्य श्रीमज्जगद्गुरू शङ्कराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी भगवान्

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