August 14, 2020

क्योकि सच कड़वा होता है..

पुलिसिया मुठभेड़(इनकाउंटर)- विधिक और न्यायिक वयवस्था से उठता भरोसा तो नहीं- प्रशांंत श्रीवास्तव(एडवोकेट)

कुख्यात अपराधी विकास दुबे की पुलिस इनकाउंटर (मुठभेड़) में हुई मौत ने एक मुद्दे को पुनः जीवित कर दिया । जहां एक ओर कानूनविदों सहित तमाम बुद्धिजीवियों ने इस इनकाउंटर पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए इसकी न्यायिक जांच की मांग की, वहीं दूसरी ओर तमाम देशवासियों ने इस इस गैंगेस्टर की मौत पर खुशी जाहिर किया, जो निश्चित तौर पर यह सिद्ध करता है कि आम जन वर्तमान न्यायिक प्रणाली और मौजूदा पुलिसिंग सिस्टम और प्रशासन तंत्र को अपराधी को दण्डित करने में लगभग अक्षम मान बैठे हैं। इसलिए किसी दुर्दांत अपराधी के मारे जाने पर खुशी मनाते है।

यह सब तात्कालिक खुशी के लिए भले ही सही मान लिया जाय।लेकिन यह सब बेहद चिंताजनक है। ऐसे तो सांवैधानिक संस्था कमजोर पड़ जाएगी और समाज में अराजकता फैल जाएगी। हमारी न्यायिक संस्थाओं से देश की जनता का विश्वास लगातार घटना बेहद चिंताजनक और न्याय व व्यवस्था के लिए बेहद घातक है। इसके लिए हमारी वर्तमान न्यायिक व्यवस्था की तमाम खामिया जिम्मेदार है जो समय के अनुकूल नही हो सकी । अंग्रेजों के समय से बने तमाम अपराधिक कानून वर्तमान परिवेश में अपराधी को दण्डित करने में लगभग अक्षम व अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इसलिए तत्काल कानून व्यवस्था में वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार इन पुराने कानूनों को हटा कर वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल नए कानूनों के निर्माण की आवश्यकता हैं, जो बिना विधायिका के दृढ़ संकल्प के सम्भव नही है ।

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पुलिस अन्वेषण के तौर तरीकों और अभियोजन पक्ष को और अधिक सक्षम और ईमानदार बनाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते यह सब सुधार न किए गए तो स्थितियां दिन व दिन खराब होती जाऐंगी और एक दिन ऐसा आएगा जब देश में हालात को सुधारना बेहद कठिन हो जाएगा।