कवियित्री नेहा सोनी की बेहतरीन रचना : सोच के समुन्द्र से मोती चुनना तो कोई कवी से ही सीखे.

तुझको पढ़ी ,तुझसे बनी ,तुझ-सी दिखी मैं हूबहू ,
तू जिंदगी, तू ही कफन ,तू ही है मेरी आबरू……..
तू मान है,गुमान है ,तू ही मेरा अभिमान है,
तू जान है “हिन्दी” मेरी, तुझसे रहूँ सदा रूबरू!!!!
©Poetessnehasoni
From -My DiArY
#Nehasoni.

 

” कर्मवीर ”

घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा …..
देके मोती सा महल वो ,शीप सा चलता रहा !!!!!

है उसे हाँ फिक्र सबकी रोटीयों और दाल की,
सर्दी के मौसम में है फिक्र कंबल साल की ……
देके गर्मी आग की वो सूर्य सा जलता रहा,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा !!!!

प्यास से मरते हुओं को, खोद डाले हैं कुँए ,
और थामा हाथ उनका, जो बाढ़ में बेघर हुए …..
बनके सबका वो हमेशा, अपनों को खलता रहा ,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा !!!!!

देके शिक्षा और दीक्षा, कोरा वो पन्ना रहा ,
भूखे-प्यासे पक्षियों का देवता, अन्ना रहा ……
जुगनुओं के वास्ते वो, शव में भी ढलता रहा ,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा ६खिलता रहा !!!!!

पीड़ितों का बन साहारा , अंग भी उसने दिये ,
दुनिया थी बेरंग जिनकी , रंग भी उसने दिये …..
बनके रक्तधार दूजी, नाड़ियों में बहता रहा ,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा !!!!!

न के अपना घर बचाकर , देश की छाया बना ,
जो मिले पगड़ड़ियों में, बच्चों की आया बना …..
देके ठौर मुसाफिरों को, ह्रदयों में पलता रहा ,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा !!!!!!

रहती उसको चेतना नित, दूसरों की पीर की ,
साग-सब्जी, दूध-पानी , और चावल-खीर की …..
बनके चूल्हा रसोईयों में, वो सदा जलता रहा ,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा !!!!!

न कोई धनवान है वो , न कोई गरीब है ,
वो सितारों का सहारा , चाँद का रकीब है …….
बनके “कर्मवीर “वो बस, दुनियाँ में मिलता रहा ,
घर अनाथो के सजाकर ,पुष्प सा खिलता रहा !!!!!!
©Poetessnehasoni
From -My DiArY
#Nehasoni.

1 comment

  • Arvind vishwakarma 1 month ago

    Very nice 👍

    Reply

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